राजुवास ई-पशुपालक चौपाल का आयोजन पॉलिथीन के उपयोग को कम करके गायों को नुकसान से बचाएं

बीकानेर 11 अगस्त। वेटरनरी विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय द्वारा राज्य स्तरीय ई-पशुपालक चौपाल में गायों में पॉलिथीन और अखाद्य पदार्थों से नुकसान और बचाव विषय पर विशेषज्ञ प्रो. टी.के. गहलोत ने पशुपालकों से संवाद किया। वेटरनरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सतीश के. गर्ग ने चौपाल में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज की वार्ता का विषय बड़ा ही सामायिक है गायों में पॉलिथीन खाने की समस्या बहुत गंभीर है जो कि गांव की तुलना में शहरों में अधिक है। पॉलिथीन के उपयोग को कम करके पशुओं को नुकसान से बचाया जा सकता हैं। कुलपति ने इस अवसर पर कहा कि वेटरनरी विश्वविद्यालय पशुपालकों के हितों के लिए निरंतर प्रसार कार्यक्रम चला रहा है तथा इस चौपाल के माध्यम से पशुपालकों को घर बैठे ही पशुपालन के विभिन्न विषयों पर तकनीकी ज्ञान मिल रहा है जिससे वे पशुओं के खाद्य, प्रजनन, रोग एवं रख रखाव सम्बंधित विभिन्न समस्याओं का सामाधान करते हुए अधिक उत्पादन से आर्थिक लाभ ले सकते हैं। आयोजन सचिव एवं निदेशक प्रसार शिक्षा प्रो. राजेश कुमार धूड़िया ने विषय प्रवर्तन करते हुए बताया कि गायों में पॉलिथीन व अन्य अखाद्य पदार्थों के खाने से पशु स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है। पॉलिथीन की पशु व मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव डालने के साथ-साथ वातावरण को प्रदूषित करने में भी अहम भूमिका है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार भारत में प्रतिदिन 25940 टन प्लास्टिक कचरा बनता है, जिसमें से 40 प्रतिशत पुनः संगृहित नहीं होता है जो नदी-नालो के प्रवाह को बाधित करने, पशु के आहार तंत्र पर दुष्प्रभाव डालने के साथ-साथ वातावरण को प्रदूषित करने वाले प्रमुख कारकों में से एक है। आंमत्रित विशेषज्ञ प्रो. टी.के. गहलोत, पूर्व निदेशक क्लिनिक्स, राजुवास, बीकानेर ने विस्तृत चर्चा करते हुए बताया कि गायों के शरीर में फास्फोरस, सोडियम, पोटेशियम एवं कैल्शियम जैसे तत्वों की कमी, पाइका रोग का प्रमुख कारण है। इस रोग से ग्रसित गाय अखाद्य पदार्थ जैसे पॉलिथीन, चमड़ा, पलास्टिक, कपड़ा, कीले, तार, कांच आदि का सेवन करती है। ये अखाद्य पदार्थ गाय की जुगाली से बाहर नहीं आते है एवं अपच एवं आफरे की समस्या उत्पन्न करते है। लोहे की कील या नुकीली वस्तु का सेवन कर लेने पर गायों में पेरिकार्डिइटिस एवं रेटीकुलाईटिस जैसी गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है जिसका शल्य चिकित्सा से ही ईलाज संभव है। इनसे गायों के उत्पादन स्तर में गिरावट आती है एवं उनकी अकाल मृत्यु भी हो सकती है अतः इन सभी समस्याओं से बचने के लिए हमें जागरूकता की आवश्यकता है। खाद्य पदार्थों को पॉलिथीन में डालकर ना फेंके, गायों को संतुलित आहार देवें, बांटे में मिनरल मिक्चर का उपयोग करें, वर्ष में तीन बार कृमि नाशक दवा पिलाएं, दूध निकालने के बाद गायों को लावारिस ना छोडे आदि बातों को ध्यान में रखकर पशुपालक इन समस्या से समाधान पा सकते है। ई-पशुपालक चौपाल में राज्यभर के पशुपालक, किसान, विश्वविद्यालय के अधिकारीगण फेसबुक पेज से जुड़े।