वेटरनरी विश्वविद्यालय राज्य स्तरीय ई-पशुपालक चैपाल पशुओं में पायका रोग: कारण और निवारण पर विशेषज्ञ वार्ता

वेटरनरी विश्वविद्यालय
राज्य स्तरीय ई-पशुपालक चैपाल
पशुओं में पायका रोग: कारण और निवारण पर विशेषज्ञ वार्ता

बीकानेर, 23 दिसम्बर। वेटरनरी विश्वविद्यालय द्वारा बुधवार को पशुओं में पायका रोग: कारण और निवारण पर राज्य स्तरीय ई-पशुपालक चैपाल का आयोजन किया गया। चैपाल में विशेषज्ञ रूप में आमंत्रित पशु प्रशिक्षण संस्थान उदयपुर के वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी डाॅ. सुरेन्द्र छंगाणी जानकारी देते हुए बताया कि पायका ग्रस्त पशु अखाद्य वस्तुएं खाना शुरू कर देते हैं जिसके कारण उनके उत्पादन स्तर में गिरावट आ जाती है एवं पशुपालकों को खासा नुकसान उठाना पड़ता है। पायका रोग से ग्रसित पशु मिट्टी, दीवार, कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी को चबाना या चाटना शुरू कर देता है। यह रोग सभी प्रकार के पशुओं में पाया जाता है लेकिन गाय, भैंस, बछडे़-बछड़िया इससे सर्वाधिक प्रभावित होते है। पशुओं के शरीर में कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्निशियम, जिंक, कोबाल्ट और लौह तत्वों की कमी एवं पेट में कृमि इसके लिए जिम्मेवार होते हैं। पशुपालक पशु में इन तत्वों की कमी के लिए प्रयोगशाला में जांच भी करवा सकते हैं। संतुलित आहार में पोषण तत्व की पूर्ति करके पशुओं में इस रोग को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। पशुपालकों को 3 माह में एक बार कृमि नाशक दवा जरूर पिलानी चाहिए। इससे पायका में कमी आती है। डाॅ. छंगाणी ने पशुपालकों की शंकाओं का समाधान करते हुए बताया कि पायका ग्रस्त पशु के दूध का उपयोग नुकसान दायक नहीं होता। पायका के घरेलू उपचार में चूने का निथरा पानी चारे-बाटे में छिड़काव, खनिज लवण और नमक का नियमित उपयोग कारगर होता है। प्रसार शिक्षा निदेशक प्रो. राजेश कुमार धूड़िया ने चैपाल का संचालन किया। प्रो. धूड़िया ने बताया कि प्रत्येक माह के दूसरे और चैथे बुधवार को श्रृंखलाबद्ध ई-पशुपालक चैपाल से राज्यभर के किसान और पशुपालक लाभान्वित हो रहे है। राजुवास के अधिकारिक फेसबुक पेज पर इसका सीधा प्रसारण देखा और सुना गया।