वेटरनरी विश्वविद्यालय में गलघोंटू रोग पर राज्य स्तरीय ई-पशुपालक चौपाल गलघोंटू पशुओं में होने वाला एक घातक संक्रामक रोग

वेटरनरी विश्वविद्यालय में
गलघोंटू रोग पर राज्य स्तरीय ई-पशुपालक चौपाल
गलघोंटू पशुओं में होने वाला एक घातक संक्रामक रोग

बीकानेर, 10 फरवरी। पशुओं में गलघोंटू रोग पर ई-पशुपालक चौपाल बुधवार को वेटरनरी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित की गई। गलघोंटू पशुओं में होने वाला एक संक्रामक घातक रोग है जिससे पशु असमय ही काल के ग्रास बन जाते हैं। इससे भैंसों में सर्वाधिक प्रभावित होने से पशुपालकों को बड़ा आर्थिक नुकसान होता है। वेटरनरी विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशक और चौपाल के संयोजक प्रो. राजेश कुमार धूड़िया ने कहा कि गले में सूजन और श्वांस में तकलीफ इसके प्रमुख लक्षण है । इससे प्रभावित पशुओं की मृत्युदर शत-प्रतिशत रहती है। लाला लाजपतराय पशुचिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार के पूर्व अनुसंधान निदेशक और आमंत्रित विशेषज्ञ प्रो. रविन्द्र शर्मा ने बताया कि इस रोग के जीवाणु स्वस्थ पशु की मांस पेशियों में बने रहते हैं जो प्रतिकूल मौसम और रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर अपने संक्रमण का तेजी से प्रभाव छोड़ते हैं। प्रांरभिक अवस्था में ही चिकित्सकीय परामर्श के अभाव में मृत्यु होना निश्चित है। तेज बुखार, नाक से श्लेष्मा का आना और श्वांस में घर्र-घर्र की आवाज इस रोग का प्रमुख लक्षण है। टीकाकरण ही इस रोग से बचाव का उपाय है। साल में दो बार इसका टीका मई-जून और नवम्बर-दिसम्बर माह में करवा लेना चाहिए। इसका टीका पूरी तरह सुरक्षित है। रोग प्रभावित पशु का दूध उपयोग में नहीं लेना चाहिए और सक्रंमित पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखा जाना चाहिए व घरेलू उपचार से बचना चाहिए। विश्वविद्यालय के आधिकारिक फेसबुक पेज पर बड़ी संख्या में ई-चौपाल को राज्य के सैंकडों पशुपालकों ने सुना और देखा।