वेटरनरी विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय मंथन का समापन कृषि वैज्ञानिकों के कार्य और जैविक पारंपरिक विधियों का प्रयोग देश के लिए उपयोगी हैः कुलपति प्रो. गहलोत

क्रमांक 1430                                                                                                                      10 मार्च, 2017

वेटरनरी विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय मंथन का समापन
कृषि वैज्ञानिकों के कार्य और जैविक पारंपरिक विधियों का प्रयोग देश के लिए उपयोगी हैः कुलपति प्रो. गहलो

बीकानेर, 10 मार्च। देश के कृषक वैाज्ञानिक अपने खेत और खलिहानों में कृषि के पारंपरिक तौर-तरीकों और प्रचलित विधियों के बूते ही कृषि व बागवानी की उपज तथा पषुपालन के उत्पादों को जैविक रूप में प्राप्त करके अन्य काष्तकारों तथा पषुपालकों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बने हैं। यह तथ्य वेटरनरी विष्वविद्यालय में अपनी किस्म के पहले ख्यातनाम कृषक वैज्ञानिकों, काष्तकारों और वैज्ञानिकों के राष्ट्रीय मंथन में उभर कर सामने आया। देष के ख्यातनाम 26 कृषक-वैज्ञानिकों ने दो दिन तक चले मंथन में अपनी कार्य विधियों से सबको अवगत करवाया। इनमें से कई कृषक-वैज्ञानिकों ने लाखों रूपये के पुरस्कार प्राप्त किए हैं तथा वे राष्ट्रपति के मेहमान के बतौर आंमत्रित भी किए गए हैं। उन्होंने इस मंथन मंे “दक्ष किसान संगठन” के गठन पर खुषी जताते हुए उन्हें उचित मंच और सम्मान की घोषणा के लिए आभार जताते हुए इसमें पूरी सहभागिता का भरोसा दिलाया। कृषक वैज्ञानिकों ने अपने खेत और खलिहानों में कृषि और बागवानी की उपज प्राप्त करने के लिए उर्वरक, कीटनाषक सूक्ष्म तत्वों तथा अन्य आदानों को देषी तौर-तरीकों से तैयार कर इस्तेमाल किया जिसके सुखद और आष्चर्यजनक परिणाम मिले हैं। उन्होंने इसके लिए गौबर, गौमूत्र, नीम, आॅक, धतूरा, तूम्बा, कीकर की पŸिायों के पेस्ट तैयार कर रोग प्रतिरोधक, कीटनाषक और उर्वरक के रूप में उपयोग किया है। पंजाब के कृषि वैज्ञानिक सुरेन्द्र सिंह जैविक उत्पाद के लिए प्रमाणित हैं। वे फाजिल्का जिले के अपने गांव में 2009 से कृषि और बागवानी में जैविक उत्पाद ले रहे हैं। उन्होंने स्वंय भी पौधों को सूक्ष्म तत्व के लिए लस्सी, गोमूत्र के साथ तांबा, जस्ता, लोहा और आवश्यक तत्वों का मिश्रण तैयार किया है और उपयोग में ले रहे हैं। उन्होंने सफेद फिटकरी व हींग का उपयोग भी कीटनाशक तैयार करने में किया है। गत दिनों एक फ्रांसीसी दंपत्ति ने उनके खेत का वैज्ञानिक परीक्षण किया और मृदा स्वास्थ्य को सही बताया है। इज्रराईल भ्रमण करने वाले कृषि वैज्ञानिक भंवर सिंह पीलीबंगा भी अपने खेतों में देशी तौर-तरीकों के उपयोग के विभिन्न प्रयोग करके फल और सब्जी का भरपूर उत्पादन ले रहे है। उन्होंने देशी नुस्खों से ग्रोथ प्रमोटर, दीमक नियंत्रण करने में कामयाबी हासिल की है। सीकर के मोटाराम मशरूम की लाभदायक खेती कर रहे हैं और उन्होंने गायों में थनैला रोग की रोेकथाम के लिए मशरूम के चारे का उपयोग करने की बात कही। इज्रराईल तक यात्रा करने वाले कृषक वैज्ञानिक लूणकरणसर (बीकानेर) के सहीराम गोदारा और झंझूनु के पशुपालक विजय लाॅयल ने भी वृत्तचित्र का प्रदर्शन कर अपने कार्यों की जानकारी दी। सिरोही जिले के श्री ईशाक अली ने “आबू सौंफ 440“ की नवीन किस्म विकसित की है। हिमाचल प्रदेश के परमाराम चैधरी ने नए कृषि यंत्रों का विकास कर जीरो से हीरो बन गए। उन्होंने बहुद्देश्यीय टीलर कम पुडलर बनाया है जो आसानी से लाया ले जाया जा सकता है। हरियाणा के धर्मवीर कम्बोज ने अपनी द्वारा निर्मित बहु-उत्पाद प्रसंस्करण मशीन का प्रदर्शन किया। उनके पुत्र प्रिंस कम्बोज अपने खेत में जड़ी-बूटियों और औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। उन्होंने विभिन्न फल उत्पादों के आचार, स्क्वेश, कैण्डी, जैली का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया है जिसकी बाजार में बेहद मांग रहती है। सीकर के सुण्डाराम ने एक लीटर पानी से पूरा पेड़ विकसित करके राष्ट्रीय-अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार प्राप्त किए हंै। हनुमानगढ़ की जसवीर कौर ने सात प्रकार के उत्पाद तैयार करने वाली “मिक्सी“, श्रवण कुमार बाजिया ने खरपतवार हटाने सहित 6 खेतिहर मशीने तथा जितेन्द्र मलिक (हरियाणा) ने मशरूम टर्निंग मशीन, कुमारी राज दहिया (जयपुर) ने बायोमाॅस कुक स्टोव विकसित किया है। राष्ट्रीय मंथन के समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए वेटरनरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ए.के. गहलोत ने कहा कि कृषि वैज्ञानिकों ने अपने व्यवसाय में कुछ नया करने की उत्कंठा है। आपने कृषि और पशुपालन में नवाचारों से एक नया अध्याय जोड़ा है। कृषि वैज्ञानिकों ने देश और काल की जरूरतों को समझते हुए अपने विशिष्ट कार्यों को अंजाम दिया है जो समाज के लिए बहुत उपयोगी हैं। उन्होंने कहा कि “दक्ष किसान संगठन“ के गठन से ऐसे विशिष्ट कार्यों को नई दिशा मिलेगी। इसमें सूचना का समूह बनाकर इन्टरनेट और मोबाइल सेवाओं का उपयोग हो सकेगा। श्री महेन्द्र मधुप ने कहा कि राष्ट्रीय मंथन बहुत ही उपयोगी रहा है। अगला राष्ट्रीय कार्यक्रम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के सौजन्य से आयोजित किया जाएगा। स्तंभ लेखक और वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम आचार्य ने कहा कि कृषि और पशुपालन एक दूसरे के पूरक हैं। राष्ट्रीय मंथन एक अद्भुत मिलन रहा है जिसके दूरगामी सुफल मिलेंगे। उन्होंने कहा कि कृषक वैज्ञानिकों के कार्य जमीन से जुड़े शाश्वत् हैं। इन कार्यों को विनम्रता के साथ जन-जन तक ले जाने की जरूरत है। समापन सत्र में प्रो. पी.आर. जटकर, प्रो. जी.एन. माथुर, प्रो. व बी.एल. पारीक भी उपस्थित थे। राष्ट्रीय मंथन के आयोजन सचिव राजुवास के प्रसार शिक्षा निदेशक प्रो. राजेश कुमार धूड़िया ने सभी का आभार जताया। अपरान्ह् पश्चात् कृषि वैज्ञानिकों और काश्तकारों-पशुपालकों ने राजुवास के म्यूजियम का अपलोकन करके पशुधन अनुसंधान केन्द्र, कोडमदेसर का भ्रमण कर गौपालन विकास कार्यों का जायजा लिया।

समन्वयक
जनसम्पर्क प्रकोष्ठ