वेटरनरी विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक उपलब्धि : श्वान में कृत्रिम गर्भाधान से राज्य में पहली बार बीगल नस्ल के 6 पिल्लों के प्रजनन में मिली सफलता

क्रमांक 1892                                                                                                          27 फरवरी, 2018

  वेटरनरी विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक उपलब्धि
श्वान में कृत्रिम गर्भाधान से राज्य में पहली बार बीगल नस्ल के 6 पिल्लों के प्रजनन में मिली सफलता

बीकानेर, 27 फरवरी। वेटरनरी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने राज्य में पहली बार विदेशी नस्ल के बीगल श्वान में कृत्रिम गर्भाधान द्वारा शुद्ध नस्ल के 6 पिल्ले प्राप्त करने में सफलता हासिल की है। राजुवास की पशुचिकित्सा वैज्ञानिक डाॅ. सुनन्दा शर्मा के निर्देशन में डाॅ. दिनेश झाम्ब और टीम श्वान की कुछ प्रजातियों में प्राकृतिक प्रजनन में सफलता नहीं मिलने की स्थिति में कृत्रिम गर्भाधान की “इन्ट्रा इनसेमिनेशन” तकनीक का इस्तेमाल कर प्रजनन करवाने में सफल रहे हैं। श्वानों की उच्च नस्लों में उनके उग्र व्यवहार और अन्य कारणों से प्राकृतिक गर्भाधान नहीं हो पाता है। वेटरनरी काॅलेज नवानियां के वैज्ञानिकों ने उदयपुर शहर के एक श्वान पालक की सहमति से उसके नर से प्राप्त बीगल के वीर्य से काॅलेज की श्वान इकाई की एक बीगल मादा से अक्टूबर 2017 में कृत्रिम गर्भाधान द्वारा गर्भित करवाया गया। वैज्ञानिकों की सामान्य देखभाल में मादा बीगल ने दिसम्बर 2017 में स्वस्थ और शुद्ध बीगल नस्ल के 6 पिल्लों को जन्म दिया है। नर बीगल से वीर्य प्राप्त करके प्रायोगिक जांच में तनुकरण और कुछ विशेष रसायनों का उपयोग करके मादा के हीट में आने के वक्त वीर्य को उसके गर्भाशय के मुख पर डाला गया और मादा ने गर्भ धारण कर लिया। वेटरनरी विश्वविद्यालय के संकाय अध्यक्ष प्रो. त्रिभुवन शर्मा ने बताया कि प्रायोगिक रूप से श्वानों में कृत्रिम गर्भाधान के सकारात्मक परिणामों के बाद राजुवास के बीकानेर और नवानियां (उदयपुर) वेटरनरी काॅलेज में श्वान प्रेमियों के लिए कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा उपलब्ध करवाना संभव हो सकेगा। वेटरनरी काॅलेज नवानियां के अधिष्ठाता प्रो. सी.एस. वैष्णव ने बताया कि कृत्रिम गर्भाधान तकनीक को आवष्यक परीक्षणों के बाद पषुपालकों के प्राकृतिक प्रजनन के अयोग्य पाए जाने वाले श्वानों में उपयोग लिया जा सकेगा।

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